• रिटेल कंपनियों और बड़े ब्रांड्स ने प्लास्टिक कैरी बैग पर पाबंदी को बनाया प्रचार और कमाई का जरिया
  • जयपुर और चंडीगढ़ के उपभोक्ता मंच इसे अवैध वसूली बता चुके

 प्लास्टिक कैरी बैग पर बैन को बड़ी रिटेल कंपनियों ने ग्राहकों को चपत लगाने का माध्यम बना लिया है। पेपर, कपड़े या जूट बैग के लिए एक से 25 रुपए तक वसूले जा रहे हैं। रिटेल कंपनियों के देश भर में सैकड़ों स्टोर और लाखों उपभोक्ता हैं। ऐसे में इस छोटी रकम की आड़ में मोटा पैसा बना रही हैं। कंपनियों की इस मनमानी के खिलाफ हाल ही में दो शहरों के उपभोक्ता मंचों ने फैसला दिया है।


गुलाबी नगर सहित देश के कमोबेश हर छोटे बड़े शहर में रिटेल कंपनियों ने अपने स्टोर खोल रखे हैं। इनमें बिगबाजार, रिलायंस ट्रेंडज और लाइफ स्टाइल शामिल हैं। इसके अलावा हर बड़ा ब्रांड अपने स्टोर भी चला रहा है। रिटेल मार्केट में उतरने से पहले और उसके बाद हर कंपनी ने उपभोक्तों को ज्यादा सुविधाएं तथा कम कीमत का दावा किया। इन्हीं कंपनियों ने प्लास्टिक कैरी बैग होने के बाद इन स्टोर पर पेपर, क्लॉथ और जूट बैग में सामान देना शुरू कर दिया। साथ इन बैग्स के लिए अलग से कीमत वसूली जा रही है।

बिग बाजार दो रुपए, बाटा तीन रुपए, लाइफ स्टाइल पांच रुपए और रिलायंस 25 रुपए तक कैरी बैग के ले रहा है। इनमें से कई के बैग पर तो उनके ब्रांड या कंपनी का नाम और लोगो होता है। ऐसे में एक तरफ ये कैरी बैग उनके प्रचार का काम कर रहे हैं, दूसरी तरफ उपभोक्ताओं से इनकी लागत वसूल रही हैं। जबकि खरीदे गए सामान की कीमत में विज्ञापनों की लागत पहले से शामिल होती है। कंपनियां इनकी लागत ज्यादा होने की दलील देती हैं। ऐसे में इन कंपनियों की नीयत पर सवाल खड़े हो रहे हैं? कंपनियां उपभोक्ताओं को कैरी बैग जैसी आधारभूत सुविधा तक उपलब्ध नहीं करा पा रही। वह व्यापार में उपभोक्ताओं के हितों का कितना ध्यान रखती होंगी।

केस-1: बाटा कंपनी ने सोडाला स्थित शो रूम पर जूते बेचते समय बिल में 2 रुपए बैग की कीमत के तौर पर जोड़ दिए। इसके बारे में न तो उपभोक्ता को बताया, ना ही शो रूम में इसका नोटिस लगा था। बैग पर बाटा का लोगो लगा था, लेकिन कीमत नहीं लिखी थी। पता चलने पर उपभोक्ता ने बैग के रुपए वापस मांगे तो इंकार कर दिया। उपभोक्ता मंच ने इसे गलत मानते हुए कंपनी को 10 हजार रुपए हर्जा-खर्चा देने का आदेश दिया। 

केस-2: चंडीगढ़ स्थित लाइफ स्टाइल शोरूम पर उपभोक्ताओं से पेपर कैरी बैग के लिए पांच रुपए वसूल किए। दो ग्राहकों ने उपभोक्ता मंच में शिकायत की। इस पर मंच ने इसे कंपनी की मनमानी ठहराया। फैसले में लिखा कि प्लास्टिक कैरी बैग को बैन करने से कंपनी को पेपर कैरी बैग के पैसे वसूलने का अधिकार नहीं मिल जाता। साथ ही उपभोक्ता से सामान हाथ में ले जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मंच ने कंपनी को हर्जे-खर्चे के 13 हजार रुपए और उपभोक्ताओं को 5 रु. अलग से वापस लौटाने का आदेश दिया।

^जूते खरीदने थे, ऑफिस से लौटते समय शो रूम से खरीद लिए। घर पहुंचते ही पिताजी ने कहा बाटा के जूते खरीदे हैं। मैंने पूछा, आपको कैसे पता चला? उन्होंने कहा बैग पर लिखा तो है। बिल में बैग की कीमत भी जुड़ी थी। मुझे लगा कंपनी ने मेरे माध्यम से प्रचार किया और पैसे भी मुझसे ली। यह उपभोक्ताओं से अन्याय है इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी। -महेश पारीक, निवासी कल्याणपुरी


^कैरी बैग चाहे वह पेपर का हो या कपड़े का, उस पर कुछ छपा हो या वह सादा हो। उपभोक्ताओं से उसकी कीमत लेना गलत है। इनकी लागत वस्तु की कीमत में शामिल है। यह उपभोक्ताओं का आधारभूत अधिकार है। कैरी बैग ना देना बिल्कुल वैसा ही है, जैसे बिल्डर अपार्टमेंट बेचे और दरवाजे पर हैंडल ना लगाकर दे। ग्राहक शिकायत जरूर करे।  -देवेन्द्र मोहन माथुर, अधिवक्ता, उपभोक्ता मामलात


^कोई भी उत्पाद बनाकर बेचा जाता है तो उस पर कीमत का उल्लेख होना जरूरी है। फिर चाहे वह पेपर बैग ही क्यों ना हो? यह उस वस्तु के निर्माता-विक्रेता की जिम्मेदारी है। ऐसी वस्तु जिससे ब्रांड का प्रमोशन होता है, उसे उपभोक्ता की सहमति के बिना बेचा भी नहीं जा सकता। यह ग्राहक हकों का उल्लंघन है। मुनाफाखोरी है। - धर्मेन्द्र चतुर्वेदी, प्रोग्राम ऑफिसर, कट्स

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