• 2014 में चार सीट जीतने वाली राजद का इस बार लगभग सूपड़ा साफ
  • एनडीए को सिर्फ जहानाबाद और पाटलिपुत्र में टक्कर दे पाया राजद

राजद नेता तेजस्वी यादव इस चुनाव में अपने पिता लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में महागठबंधन के नेता थे। बाहैसियत महागठबंधन नेता उन्होंने पूरे बिहार में सवा दो सौ से ज्यादा सभाएं की और दो दर्जन से अधिक रोड शो किए। यहां तक की कांग्रेस ने भी कई सीटों पर अपने उम्मीदवारों की जीत का दारोमदार तेजस्वी पर ही छोड़ दिया था।

महागठबंधन की तीन अन्य सहयोगी रालोसपा, वीआईपी और हम तो तेजस्वी के सहारे ही इस चुनाव मैदान में उतरे थे। हालांकि, लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद राजद नेता भी अब कानाफूसी करने लगे हैं कि तेजस्वी अपनी पहली ही परीक्षा में फेल हो गए हैं।

न 90% आरक्षण काम आया और न लालू फैक्टर
यह पहला चुनाव था जिसमें करीब तीन दशकों से बिहार की राजनीति के पर्याय बने राजद अध्यक्ष लालू यादव प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में चुनाव मैदान में नहीं उतरे। सिर्फ प्रत्याशी चयन में उनकी भूमिका दिखी। महागठबंधन को सत्ता में लाने की जिम्मेवारी उन्होंने अपने बेटे तेजस्वी यादव को सौंप दी। वाल्मीकि नगर से लेकर बांका और सासाराम से लेकर किशनगंज शायद ही कोई विधानसभा क्षेत्र बचा हो, जहां तेजस्वी ने चुनाव प्रचार नहीं किया।

अपने पिता द्वारा तय चुनावी मानकों 90 प्रतिशत आरक्षण, सवर्ण आरक्षण का विरोध, वंचितों के साथ अन्याय और आरएसएस-भाजपा को मनुवादी बताते हुए तेजस्वी ने धुआंधार प्रचार किया। एक सुपौल लोकसभा क्षेत्र को छोड़ दें तो तेजस्वी ने 39 लोकसभा क्षेत्र में महागठबंधन के पांचों दलों के प्रत्याशियों के प्रचार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, परिणाम से यह स्पष्ट हो गया कि तेजस्वी यादव की इस चुनाव में कहीं नहीं चली। न तो उनका 90 प्रतिशत आरक्षण का का दांव काम आया और न ही पिता लालू प्रसाद को जेल से बाहर निकालने का भावनात्मक प्रचार लोगों के मत्थे चढ़ा। 

अपने साथ-साथ सहयोगियों की भी लुटियां डुबोई
राजद समर्थकों का भी कहना है कि पीएम मोदी के राष्ट्रवाद ने राजद के जातिवाद को बहुत पीछे छोड़ दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो बिहार के राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इस बार लालू ने जातीय दृष्टिकोण से सवर्णों और वैश्यों को छोड़कर अन्य जातियों का जो गुलदस्ता बनाया था उससे वर्ष 2004 का रिजल्ट कागजों पर दिखता।

लेकिन] हुआ ठीक इसके उलट। राजद नेता तेजस्वी ने सिर्फ अपनी ही नहीं, अपने सहयोगियों कांग्रेस, वीआईपी, रालोसपा और हम चारों दलों को भी फायदा नहीं कर सके। अब जो नई राजनीतिक परिस्थिति दिख रही है, अगर न्यायालय से उनके पिता लालू यादव को जमानत नहीं मिलता है तो राजनीतिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि वे शायद ही अपनी पार्टी राजद को टूट से बचा पाएंगे।